Passage 50.1
तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत्तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः [सन्ति] । सः यः अस्य प्राङ्सुषिः [अस्ति], सः प्राणः [अस्ति]; तत् चक्षुः [अस्ति]; सः आदित्यः [अस्ति] । तत् एतत् तेजः अन्नाद्यम् इति उपासीत । यः एवम् वेद, [सः] तेजस्वी अन्नादः भवति ।
हिन्दी अर्थ
इस हृदय के पाँच दिव्य छिद्र हैं। उसका जो पूर्व की ओर का छिद्र है, वह प्राण है, वही नेत्र है और वही आदित्य है। इसे तेज और अन्न-भोग मानकर ध्यान करे। जो इस प्रकार जानता है, वह तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होता है।
English meaning
This heart has five divine openings. Its eastern opening is prāṇa; it is sight, and it is the sun. One should contemplate it as radiance and the enjoyment of food. One who knows this becomes radiant and an enjoyer of food.
व्याख्या
प्राण, नेत्र और आदित्य एक ही ध्यान-शृंखला के तीन स्तर हैं। तेज और अन्न-भोग ध्यान का विषय है और उसी का अनुरूप फल तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होना बताया गया है। यह सूक्ष्म ध्यान-मानचित्र है, रक्तवाहिकाओं या नसों का आधुनिक चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
Explanation
prāṇa, sight and the sun occupy three levels of one contemplative correspondence. The prescribed qualities, radiance and the enjoyment of food, reappear in the promised result. This is a contemplative map, not a modern medical description of vessels or nerves.
संदर्भ
हृदयाकाश के बाद उसके पूर्व दिशा के द्वार को जीवन-शक्ति और विश्व के एक पक्ष से जोड़ा जाता है।
Context
Following the heart’s space, its eastern opening is linked with a vital power and a cosmic counterpart.