Passage 50.3
अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक्सोऽग्निस्तदेतद्ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यः अस्य प्रत्यङ्सुषिः [अस्ति], सः अपानः [अस्ति]; सा वाक् [अस्ति]; सः अग्निः [अस्ति] । तत् एतत् ब्रह्मवर्चसम् अन्नाद्यम् इति उपासीत । यः एवम् वेद, [सः] ब्रह्मवर्चसी अन्नादः भवति ।
हिन्दी अर्थ
अब उसका जो पश्चिम की ओर का छिद्र है, वह अपान है, वही वाणी है और वही अग्नि है। इसे ब्रह्मवर्चस् और अन्न-भोग मानकर ध्यान करे। जो इस प्रकार जानता है, वह ब्रह्मवर्चस् से युक्त और अन्न का भोक्ता होता है।
English meaning
Its western opening is apāna; it is speech, and it is fire. One should contemplate it as sacred radiance and the enjoyment of food. One who knows this becomes endowed with sacred radiance and an enjoyer of food.
व्याख्या
अपान, वाणी और अग्नि एक ही ध्यान-शृंखला के तीन स्तर हैं। ब्रह्मवर्चस् और अन्न-भोग ध्यान का विषय है और उसी का अनुरूप फल ब्रह्मवर्चस् से युक्त और अन्न का भोक्ता होना बताया गया है। यह सूक्ष्म ध्यान-मानचित्र है, रक्तवाहिकाओं या नसों का आधुनिक चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
Explanation
apāna, speech and fire occupy three levels of one contemplative correspondence. The prescribed qualities, sacred radiance and the enjoyment of food, reappear in the promised result. This is a contemplative map, not a modern medical description of vessels or nerves.
संदर्भ
हृदयाकाश के बाद उसके पश्चिम दिशा के द्वार को जीवन-शक्ति और विश्व के एक पक्ष से जोड़ा जाता है।
Context
Following the heart’s space, its western opening is linked with a vital power and a cosmic counterpart.