Passage 47.1
अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यत् पञ्चमम् अमृतम् [अस्ति], तत् साध्याः ब्रह्मणा मुखेन उपजीवन्ति । वै देवाः न अश्नन्ति, न पिबन्ति; एतत् एव अमृतम् दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।
हिन्दी अर्थ
अब उस पाँचवें अमृत पर साध्य देवता ब्रह्मा को मुख बनाकर जीवन धारण करते हैं। देवता न खाते हैं, न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।
English meaning
The Sādhyas live on that fifth nectar, with Brahmā as their mouth. The gods do not eat or drink; they are satisfied simply by seeing this nectar.
व्याख्या
ब्रह्मा का मुख होना देवसमूह के अग्रस्थान या माध्यम की छवि है। तृप्ति दृष्टि से होती है, भौतिक खाने-पीने से नहीं; यह बात मधु के रूपक को सामान्य आहार से स्पष्ट रूप से अलग करती है।
Explanation
Brahmā as the group’s mouth suggests a leading or mediating role. Satisfaction comes through seeing, explicitly not through physical eating and drinking, distinguishing this divine honey from ordinary food.
संदर्भ
पाँच अमृतों में पाँचवें को अब साध्य देवगण के साथ जोड़ा जाता है।
Context
The fifth of the five nectars is now related to the Sādhyas.