Passage 50.5
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यः अस्य ऊर्ध्वः सुषिः [अस्ति], सः उदानः [अस्ति]; सः वायुः [अस्ति]; सः आकाशः [अस्ति] । तत् एतत् ओजः च महः च इति उपासीत । यः एवम् वेद, [सः] ओजस्वी महस्वान् भवति ।
हिन्दी अर्थ
अब उसका जो ऊपर की ओर का छिद्र है, वह उदान है, वही वायु है और वही आकाश है। इसे ओज और महिमा मानकर ध्यान करे। जो इस प्रकार जानता है, वह ओजस्वी और महिमावान् होता है।
English meaning
Its upward opening is udāna; it is wind, and it is space. One should contemplate it as vigor and greatness. One who knows this becomes vigorous and great.
व्याख्या
उदान, वायु और आकाश एक ही ध्यान-शृंखला के तीन स्तर हैं। ओज और महिमा ध्यान का विषय है और उसी का अनुरूप फल ओजस्वी और महिमावान् होना बताया गया है। यह सूक्ष्म ध्यान-मानचित्र है, रक्तवाहिकाओं या नसों का आधुनिक चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
Explanation
udāna, wind and space occupy three levels of one contemplative correspondence. The prescribed qualities, vigor and greatness, reappear in the promised result. This is a contemplative map, not a modern medical description of vessels or nerves.
संदर्भ
हृदयाकाश के बाद उसके ऊपर दिशा के द्वार को जीवन-शक्ति और विश्व के एक पक्ष से जोड़ा जाता है।
Context
Following the heart’s space, its upward opening is linked with a vital power and a cosmic counterpart.