Passage 93.1
अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ [सः] याम् द्वितीयाम् [आहुतिम्] जुहुयात्, ताम् व्यानाय स्वाहा इति जुहुयात् । व्यानः तृप्यति ।
हिन्दी अर्थ
फिर जो दूसरी आहुति दे, उसे “व्यान के लिए स्वाहा” कहकर दे। इससे व्यान तृप्त होता है।
English meaning
Then the second offering should be made with “Svāhā to vyāna.” Vyāna is thereby satisfied.
व्याख्या
व्यान पाँच नामित प्राण-वृत्तियों में एक है। इस पद में केवल आहुति और उसकी तृप्ति है; अगले पद में उससे जुड़ी इन्द्रिय और विश्व-तत्त्वों का विस्तार आएगा।
Explanation
Vyāna is one of five named vital functions. This unit gives the offering and its satisfaction; the next unfolds the associated faculty and cosmic powers.
संदर्भ
भोजन-यज्ञ की दूसरी आहुति व्यान को समर्पित है।
Context
The second offering in the meal-sacrifice is dedicated to vyāna.