Passage 50.2
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रꣳस चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान्यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यः अस्य दक्षिणः सुषिः [अस्ति], सः व्यानः [अस्ति]; तत् श्रोत्रम् [अस्ति]; सः चन्द्रमाः [अस्ति] । तत् एतत् श्रीः च यशः च इति उपासीत । यः एवम् वेद, [सः] श्रीमान् यशस्वी भवति ।
हिन्दी अर्थ
अब उसका जो दक्षिण की ओर का छिद्र है, वह व्यान है, वही श्रवण है और वही चन्द्रमा है। इसे श्री और यश मानकर ध्यान करे। जो इस प्रकार जानता है, वह श्रीमान् और यशस्वी होता है।
English meaning
Its southern opening is vyāna; it is hearing, and it is the moon. One should contemplate it as prosperity and fame. One who knows this becomes prosperous and renowned.
व्याख्या
व्यान, श्रवण और चन्द्रमा एक ही ध्यान-शृंखला के तीन स्तर हैं। श्री और यश ध्यान का विषय है और उसी का अनुरूप फल श्रीमान् और यशस्वी होना बताया गया है। यह सूक्ष्म ध्यान-मानचित्र है, रक्तवाहिकाओं या नसों का आधुनिक चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
Explanation
vyāna, hearing and the moon occupy three levels of one contemplative correspondence. The prescribed qualities, prosperity and fame, reappear in the promised result. This is a contemplative map, not a modern medical description of vessels or nerves.
संदर्भ
हृदयाकाश के बाद उसके दक्षिण दिशा के द्वार को जीवन-शक्ति और विश्व के एक पक्ष से जोड़ा जाता है।
Context
Following the heart’s space, its southern opening is linked with a vital power and a cosmic counterpart.