Passage 89.1
अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वँरयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ [सः] बुडिलम् आश्वतराश्विम् ह, वैयाघ्रपद्य, त्वम् कम् आत्मानम् उपास्से इति उवाच । [सः], भगवः राजन्, अपः एव [उपासे] इति ह उवाच । [सः], त्वम् यम् आत्मानम् उपास्से, एषः वै रयिः आत्मा वैश्वानरः [अस्ति]; तस्मात् त्वम् रयिमान् पुष्टिमान् असि [इति उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
फिर राजा ने बुडिल आश्वतराश्वि से पूछा, “वैयाघ्रपद्य, तुम किसे आत्मा मानकर उपासना करते हो?” उन्होंने कहा, “भगवन् राजन्, जल को ही।” राजा बोले, “जिसे तुम आत्मा मानकर उपासते हो, वह रयि नाम वाला वैश्वानर आत्मा है। इसी से तुम धनवान् और पुष्ट हो।”
English meaning
The king next asked Buḍila Āśvatarāśvi, “Vaiyāghrapadya, what do you contemplate as the self?” He replied, “Water alone, revered king.” The king said, “The self you contemplate is Vaiśvānara called Rayi, wealth. That is why you possess wealth and nourishment.”
व्याख्या
रयि सम्पदा है और रयिमान् उसी सम्पदा का अधिकारी। पुष्टिमान् पोषित होने का अतिरिक्त फल है; जल की जीवन-पोषक भूमिका से दोनों का सम्बन्ध बनाया गया है।
Explanation
Rayi means wealth, and rayimān one who has it. Puṣṭimān adds the separate quality of being well nourished. Both are linked with water’s sustaining role.
संदर्भ
पाँचवाँ ध्यान जल को पोषण और सम्पदा से जोड़ता है।
Context
The fifth contemplation connects water with nourishment and wealth.