Passage 50.4
अथ योऽस्योदङ्सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान्भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यः अस्य उदङ्सुषिः [अस्ति], सः समानः [अस्ति]; तत् मनः [अस्ति]; सः पर्जन्यः [अस्ति] । तत् एतत् कीर्तिः च व्युष्टिः च इति उपासीत । यः एवम् वेद, [सः] कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति ।
हिन्दी अर्थ
अब उसका जो उत्तर की ओर का छिद्र है, वह समान है, वही मन है और वही पर्जन्य है। इसे कीर्ति और व्युष्टि, अर्थात् प्रस्फुटित समृद्धि मानकर ध्यान करे। जो इस प्रकार जानता है, वह कीर्तिमान् और प्रस्फुटित समृद्धि से युक्त होता है।
English meaning
Its northern opening is samāna; it is mind, and it is Parjanya. One should contemplate it as renown and flourishing. One who knows this becomes renowned and flourishing.
व्याख्या
समान, मन और पर्जन्य एक ही ध्यान-शृंखला के तीन स्तर हैं। कीर्ति और व्युष्टि, अर्थात् प्रस्फुटित समृद्धि ध्यान का विषय है और उसी का अनुरूप फल कीर्तिमान् और प्रस्फुटित समृद्धि से युक्त होना बताया गया है। यह सूक्ष्म ध्यान-मानचित्र है, रक्तवाहिकाओं या नसों का आधुनिक चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
Explanation
samāna, mind and Parjanya occupy three levels of one contemplative correspondence. The prescribed qualities, renown and flourishing, reappear in the promised result. This is a contemplative map, not a modern medical description of vessels or nerves.
संदर्भ
हृदयाकाश के बाद उसके उत्तर दिशा के द्वार को जीवन-शक्ति और विश्व के एक पक्ष से जोड़ा जाता है।
Context
Following the heart’s space, its northern opening is linked with a vital power and a cosmic counterpart.