Passage 63.1
हꣳसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङुपोपविवेश ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[अग्निः आह—] हंसः ते पादम् वक्ता इति । सः ह श्वोभूते [अहनि] गाः अभिप्रस्थापयाञ्चकार । ताः यत्र अभिसायम् बभूवुः, तत्र अग्निम् उपसमाधाय गाः उपरुध्य समिधम् आधाय अग्नेः पश्चात् प्राङ् उपोपविवेश ।
हिन्दी अर्थ
अग्नि ने कहा: “हंस तुम्हें एक पाद बताएगा।” अगले दिन सत्यकाम ने गायों को आगे चलाया। सायंकाल वे जहाँ पहुँचीं, वहाँ उसने अग्नि प्रज्वलित की, गायों को रोककर रखा, समिधा डाली और अग्नि के पश्चिम में पूर्व की ओर मुख करके बैठ गया।
English meaning
Fire said, “A swan will tell you a quarter.” The next day Satyakāma set the cows moving. Where they reached toward evening, he kindled a fire, secured the cows, placed fuel on the fire, and sat to its west facing east.
व्याख्या
एक-जैसी दैनिक तैयारी का पुनरावर्तन कथा की शिक्षण-लय है। इस स्रोत में पूरा प्रसंग मौजूद है; किसी तुलना-पाठ में इकाई न होने से इसे हटाया नहीं जाना चाहिए।
Explanation
The repeated daily preparations create a deliberate narrative rhythm. The complete scene is present in the selected source and must not be removed because a comparison transcription omits it.
संदर्भ
यात्रा की अगली संध्या अग्नि से हंस की शिक्षा की ओर ले जाती है।
Context
The next evening of the journey leads from fire’s instruction to the swan’s.