Passage 45.1
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यत् तृतीयम् अमृतम् [अस्ति], तत् आदित्याः वरुणेन मुखेन उपजीवन्ति । वै देवाः न अश्नन्ति, न पिबन्ति; एतत् एव अमृतम् दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।
हिन्दी अर्थ
अब उस तीसरे अमृत पर आदित्य देवता वरुण को मुख बनाकर जीवन धारण करते हैं। देवता न खाते हैं, न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।
English meaning
The Ādityas live on that third nectar, with Varuṇa as their mouth. The gods do not eat or drink; they are satisfied simply by seeing this nectar.
व्याख्या
वरुण का मुख होना देवसमूह के अग्रस्थान या माध्यम की छवि है। तृप्ति दृष्टि से होती है, भौतिक खाने-पीने से नहीं; यह बात मधु के रूपक को सामान्य आहार से स्पष्ट रूप से अलग करती है।
Explanation
Varuṇa as the group’s mouth suggests a leading or mediating role. Satisfaction comes through seeing, explicitly not through physical eating and drinking, distinguishing this divine honey from ordinary food.
संदर्भ
पाँच अमृतों में तीसरे को अब आदित्य देवगण के साथ जोड़ा जाता है।
Context
The third of the five nectars is now related to the Ādityas.