Passage 68.1
अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह अन्वाहार्यपचनः एनम् अनुशशास—आपः, दिशः, नक्षत्राणि, चन्द्रमाः इति [मम तनवः सन्ति] । यः एषः चन्द्रमसि पुरुषः दृश्यते, सः अहम् अस्मि; सः एव अहम् अस्मि इति ।
हिन्दी अर्थ
फिर अन्वाहार्यपचन अग्नि ने उसे शिक्षा दी: “जल, दिशाएँ, नक्षत्र और चन्द्रमा मेरे रूप हैं। चन्द्रमा में जो पुरुष दिखाई देता है, वही मैं हूँ; मैं वही हूँ।”
English meaning
Then the Anvāhāryapacana fire instructed him: “The waters, directions, stars and moon are my forms. The person seen in the moon is I; I am that very one.”
व्याख्या
अन्वाहार्यपचन दक्षिण की उस अग्नि का नाम है जो अन्वाहार्य भोजन पकाने से सम्बद्ध है। यहाँ जल, दिशाएँ, नक्षत्र और चन्द्रमा एक नया चार-अंगी समूह हैं; उन्हें गार्हपत्य की पिछली सूची से मिलाना नहीं चाहिए।
Explanation
The Anvāhāryapacana is the southern fire associated with preparing the anvāhārya meal. Waters, directions, stars and moon form a new fourfold group, distinct from the Gārhapatya’s list.
संदर्भ
दूसरी अग्नि अपने सम्बन्धों को चन्द्रमा तक विस्तृत करती है।
Context
The second fire extends its correspondences to the moon.