Passage 98.1
श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तँ ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
श्वेतकेतुः आरुणेयः ह आस । तम् ह पिता, श्वेतकेतो, ब्रह्मचर्यम् वस; सोम्य, अस्मत्कुलीनः अननूच्य ब्रह्मबन्धुः इव न वै भवति इति उवाच ।
हिन्दी अर्थ
अरुण के वंश में श्वेतकेतु था। उसके पिता ने उससे कहा, “श्वेतकेतु, ब्रह्मचर्य का जीवन बिताओ। प्रिय, हमारे कुल का कोई व्यक्ति अध्ययन किए बिना केवल जन्म के कारण ब्राह्मण कहलाने वाले के समान नहीं होता।”
English meaning
There was Śvetaketu, a descendant of Aruṇa. His father said to him, “Śvetaketu, enter the life of a Vedic student. My dear, no one of our family goes without study and becomes merely a Brahmin by kinship.”
व्याख्या
ब्रह्मबन्धु यहाँ कुल-सम्बन्ध तो रखने पर शिक्षा न पाने वाले के लिए आलोचनात्मक पद है। यह प्राचीन सामाजिक सन्दर्भ है, जन्माधारित श्रेष्ठता की संपादकीय स्वीकृति नहीं। सोम्य पिता का स्नेहपूर्ण सम्बोधन है।
Explanation
Brahmabandhu contrasts inherited affiliation with acquired learning. The expression belongs to the text’s historical social setting, not an editorial endorsement of hereditary superiority. Somya is an affectionate form of address.
संदर्भ
पिता अपने पुत्र को शिक्षाग्रहण के लिए भेजकर संवाद की पृष्ठभूमि बनाते हैं।
Context
The father’s call to study establishes the setting for the dialogue.