Passage 69.1
अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह आहवनीयः एनम् अनुशशास—प्राणः, आकाशः, द्यौः, विद्युत् इति [मम तनवः सन्ति] । यः एषः विद्युति पुरुषः दृश्यते, सः अहम् अस्मि; सः एव अहम् अस्मि इति ।
हिन्दी अर्थ
फिर आहवनीय अग्नि ने उसे शिक्षा दी: “प्राण, आकाश, द्युलोक और बिजली मेरे रूप हैं। बिजली में जो पुरुष दिखाई देता है, वही मैं हूँ; मैं वही हूँ।”
English meaning
Then the Āhavanīya fire instructed him: “Vital breath, space, heaven and lightning are my forms. The person seen in lightning is I; I am that very one.”
व्याख्या
आहवनीय आहुतियाँ देने की अग्नि है। इस अनुच्छेद में विद्युति, बिजली में, को आदित्ये या चन्द्रमसि में नहीं बदलना चाहिए: तीनों अग्नियों का क्रम अलग दृश्य केन्द्र रखता है।
Explanation
The Āhavanīya is the fire into which offerings are made. “In lightning” must not be replaced with “in the sun” or “in the moon”: each of the three teachings has a distinct visible focus.
संदर्भ
तीसरी अग्नि का उपदेश प्राण से बिजली तक के समूह को सामने रखता है।
Context
The third fire’s teaching presents a group extending from breath to lightning.