Passage 108.1
अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सोम्य, अस्य महतः वृक्षस्य मूले यः अभ्याहन्यात्, [सः वृक्षः] जीवन् स्रवेत्; मध्ये यः अभ्याहन्यात्, [सः वृक्षः] जीवन् स्रवेत्; अग्रे यः अभ्याहन्यात्, [सः वृक्षः] जीवन् स्रवेत् । सः एषः जीवेन आत्मना अनुप्रभूतः पेपीयमानः मोदमानः तिष्ठति ।
हिन्दी अर्थ
“प्रिय, इस बड़े वृक्ष की जड़ में कोई चोट करे तो जीवित रहते हुए उससे रस बहेगा; बीच में चोट करे तो जीवित रहते रस बहेगा; ऊपर चोट करे तो जीवित रहते रस बहेगा। यह जीवस्वरूप आत्मा से व्याप्त होकर पीता हुआ, प्रसन्न रहता हुआ खड़ा है।”
English meaning
“My dear, if someone struck this great tree at its root, it would exude sap while alive; if struck in the middle, it would exude sap while alive; if struck at the top, it would exude sap while alive. Pervaded by the living self, it stands drinking and flourishing.”
व्याख्या
मूल, मध्य और अग्र के तीन स्थानों पर वही प्रतिक्रिया कही गई है। पीना और मोदमान होना वृक्ष के पोषण और फलने-फूलने की जीवन्त भाषा है; इसे मनुष्य जैसी अनुभूति का आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं कहा गया।
Explanation
The same response is described at root, middle, and top. Drinking and rejoicing are vivid language for nourishment and flourishing, not a modern scientific demonstration of human-like feeling in trees.
संदर्भ
जीवित वृक्ष में रस का प्रवाह जीवन की उपस्थिति का उदाहरण बनता है।
Context
The flow of sap in a living tree exemplifies the presence of life.