Passage 87.1
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ [सः] इन्द्रद्युम्नम् भाल्लवेयम् ह, वैयाघ्रपद्य, त्वम् कम् आत्मानम् उपास्से इति उवाच । [सः], भगवः राजन्, वायुम् एव [उपासे] इति ह उवाच । [सः], त्वम् यम् आत्मानम् उपास्से, एषः वै पृथग्वर्त्मा आत्मा वैश्वानरः [अस्ति]; तस्मात् त्वाम् पृथक् बलयः आयन्ति, पृथक् रथश्रेणयः अनुयन्ति [इति उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
फिर राजा ने इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय से पूछा, “वैयाघ्रपद्य, तुम किसे आत्मा मानकर उपासना करते हो?” उन्होंने कहा, “भगवन् राजन्, वायु को ही।” राजा बोले, “जिसे तुम आत्मा मानकर उपासते हो, वह पृथग्वर्त्मा नाम वाला वैश्वानर आत्मा है। इसी से तुम्हारे पास भिन्न-भिन्न दिशाओं से भेंटें आती हैं और रथों की अलग-अलग पंक्तियाँ तुम्हारे पीछे चलती हैं।”
English meaning
The king next asked Indradyumna Bhāllaveya, “Vaiyāghrapadya, what do you contemplate as the self?” He replied, “Wind alone, revered king.” The king said, “The self you contemplate is Vaiśvānara called Pṛthagvartman, having diverse paths. That is why offerings come to you from different quarters, and separate rows of chariots follow you.”
व्याख्या
पृथग्वर्त्मा और दो बार पृथक् आने में सम्बन्ध है। बलयः यहाँ भेंटें या कर-सदृश अर्पण हैं, शारीरिक बलों की सूची नहीं; रथपंक्तियाँ दूसरी स्वतंत्र सम्पदा हैं।
Explanation
Pṛthagvartman is echoed by the two uses of pṛthak. Balayaḥ here means offerings or tribute, not bodily strengths; the lines of chariots are a second distinct possession.
संदर्भ
तीसरी उपासना वायु की अनेक दिशाओं में गति को ग्रहण करती है।
Context
The third contemplation takes up wind’s movement along many courses.