Passage 149.1
य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीदꣳ शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः एषः स्वप्ने महीयमानः चरति, एषः आत्मा इति ह उवाच; एतत् अमृतम् अभयम्, एतत् ब्रह्म इति । सः ह शान्तहृदयः प्रवव्राज । सः ह देवान् अप्राप्य एव एतत् भयम् ददर्श—तत् यद्यपि इदम् शरीरम् अन्धम् भवति, सः अनन्धः भवति; यदि [इदम् शरीरम्] स्रामम् [भवति], [सः] अस्रामः [भवति] । एषः अस्य दोषेण न एव दुष्यति ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने कहा, “जो स्वप्न में सम्मानित होकर विचरता है, यही आत्मा है। यह अमृत है, अभय है, यह ब्रह्म है।” इन्द्र सन्तुष्ट मन से चला गया। पर देवों तक पहुँचने से पहले ही उसे इसमें यह भय दिखाई दिया: “यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है, वह स्वप्न वाला अन्धा नहीं होता; शरीर रोगग्रस्त हो तो वह रोगग्रस्त नहीं होता। यह उसके शारीरिक दोष से दूषित नहीं होता।”
English meaning
He said, “The one who moves about in dreams, enjoying honor, is the self. This is immortal and fearless; this is Brahman.” Indra departed content at heart. But before reaching the gods, he perceived this danger: “Although this body may be blind, that dream-person is not blind; if the body is afflicted, he is not afflicted. He is not impaired by the body’s impairment.”
व्याख्या
इस अनुच्छेद में इन्द्र पहले स्वप्न-व्यक्ति की शरीर से भिन्नता स्वीकार करते हैं; उसकी कठिनाई अगले अनुच्छेद में आएगी। महीयमान का अर्थ सम्मानित या समृद्ध अनुभव करना है, केवल काल्पनिक आकार बढ़ना नहीं।
Explanation
Here Indra first acknowledges the dream-person’s difference from the body; the problem follows in the next unit. Mahīyamāna suggests being honored or enjoying an exalted experience, not merely growing in imaginary size.
संदर्भ
दूसरी अवस्था में स्वप्न का अनुभव स्थूल शरीर से कुछ स्वतंत्र दिखाई देता है।
Context
In the second stage, dream experience appears partly independent of the physical body.