Passage 116.1
मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्राँश्च पशूँश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
मनः वाव वाचः भूयः [अस्ति] । यथा वै मुष्टिः द्वे वा आमलके, द्वे वा कोले, द्वौ वा अक्षौ अनुभवति, एवम् मनः वाचम् च नाम च अनुभवति । सः यदा मनसा, मन्त्रान् अधीयीय इति मनस्यति, अथ अधीते; कर्माणि कुर्वीय इति [मनस्यति], अथ कुरुते; पुत्रान् च पशून् च इच्छेय इति [मनस्यति], अथ इच्छते; इमम् च लोकम् अमुम् च इच्छेय इति [मनस्यति], अथ इच्छते । मनः हि आत्मा [अस्ति]; मनः हि लोकः [अस्ति]; मनः हि ब्रह्म [अस्ति]; मनः उपास्स्व इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
“मन वाणी से बढ़कर है। जैसे मुट्ठी दो आँवले, दो बेर या दो पासे अपने भीतर समेट लेती है, वैसे ही मन वाणी और नाम को समेटता है। जब कोई मन से सोचता है, ‘मैं मन्त्रों का अध्ययन करूँ’, तब वह अध्ययन करता है; ‘मैं कर्म करूँ’, तब कर्म करता है; ‘मैं पुत्रों और पशुओं की इच्छा करूँ’, तब उनकी इच्छा करता है; ‘मैं इस लोक और उस लोक की इच्छा करूँ’, तब उनकी इच्छा करता है। मन ही आत्मा है, मन ही लोक है, मन ही ब्रह्म है। मन की उपासना करो।”
English meaning
“Mind is greater than speech. As a fist encloses two āmalaka fruits, two jujubes, or two dice, mind encompasses speech and name. When one thinks, ‘Let me study the sacred formulas,’ one studies; ‘Let me perform actions,’ one acts; ‘Let me desire sons and livestock,’ one desires them; ‘Let me desire this world and the other,’ one desires them. Mind is indeed the self, mind the world, mind brahman. Contemplate mind.”
व्याख्या
मुट्ठी की तीन उपमाएँ और चार इच्छासूचक उदाहरण अलग-अलग रखे गए हैं। मन को आत्मा, लोक और ब्रह्म कहना इस उपासना-स्तर का निर्देश है; आगे मन से भी अधिक व्यापक आधार पूछे जाएँगे।
Explanation
The three fist comparisons and four examples of intention are distinct. Calling mind self, world and brahman belongs to this contemplative stage; the inquiry will still seek what exceeds mind.
संदर्भ
वाणी और नाम को अपने भीतर रखने तथा व्यवहार आरम्भ कराने की क्षमता से मन का स्थान समझाया जाता है।
Context
Mind’s priority is explained through its encompassing speech and name and initiating intentional activity.