Passage 21.1
अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधꣳसामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ सप्तविधस्य [उपासनम् उच्यते] । वाचि सप्तविधम् साम उपासीत । वाचः यत् किञ्च हुम् इति [भवति], सः हिङ्कारः [अस्ति] । यत् प्र इति [भवति], सः प्रस्तावः [अस्ति] । यत् ए इति [भवति], सः आदिः [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
अब सात अंगों वाले साम की चर्चा है। वाणी में सात अंगों वाले साम की उपासना करे: वाणी में जो “हुम्” है वह हिङ्कार है, जो “प्र” है वह प्रस्ताव है और जो “आ” है वह आदि है।
English meaning
Now comes the seven-part Sāman. One should contemplate it in speech: the sound hum is hiṅkāra, pra is prastāva, and ā is ādi.
व्याख्या
ये ध्वनियाँ सामान्य वाक्य का अर्थ नहीं बनातीं; वे साम-अंगों के नामों की ध्वन्यात्मक संगति स्थापित करती हैं। यदेति का पदच्छेद यत् आ इति है।
Explanation
These sounds are not an ordinary sentence; they establish phonetic associations with the chant portions. Yadeti is resolved as yat ā iti.
संदर्भ
अब साम के सात अंगों की उपासना आरम्भ होती है। वाणी के छोटे ध्वनि-रूपों को सात अंगों के नामों से जोड़ा जाता है।
Context
Contemplation of the seven-part Sāman now begins. Short speech sounds are connected with the names of its seven portions.