Passage 98.2
स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विँशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तँह पितोवाच ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह द्वादशवर्षः [आचार्यम्] उपेत्य सर्वान् वेदान् अधीत्य, चतुर्विंशतिवर्षः महामनाः अनूचानमानी स्तब्धः एयाय । तम् ह पिता उवाच ।
हिन्दी अर्थ
वह बारह वर्ष का होकर गुरु के पास गया और चौबीस वर्ष का होने पर सभी वेदों का अध्ययन करके लौटा। उसे अपने विषय में बड़ा अभिमान था, वह स्वयं को विद्वान समझता था और अकड़ा हुआ था। तब पिता ने उससे कहा।
English meaning
He went to his teacher at twelve and returned at twenty-four, having studied all the Vedas. He was proud, considered himself learned, and carried himself stiffly. His father then addressed him.
व्याख्या
बारह और चौबीस की आयु दोनों सुरक्षित हैं। महामना को यहाँ प्रशंसा की बजाय अभिमान के रूप में समझने का आधार अनूचानमानी और स्तब्ध है। अगले अनुच्छेद में पिता का कथन जारी है।
Explanation
Both ages are retained. The neighboring descriptions of self-regard and stiffness make “proud” appropriate for mahāmanāḥ here rather than simply “great-minded.” The father’s speech follows in the next unit.
संदर्भ
औपचारिक शिक्षा पूरी होने पर पिता पुत्र के आत्मसन्तोष को परखते हैं।
Context
With the formal course completed, the father tests his son’s complacency.