Passage 63.4
स य एतमेवं विद्वाꣳश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिꣳल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाꣳश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः एतम् ब्रह्मणः चतुष्कलम् पादम् एवम् विद्वान् ज्योतिष्मान् इति उपास्ते, सः अस्मिन् लोके ज्योतिष्मान् भवति । यः एतम् ब्रह्मणः चतुष्कलम् पादम् एवम् विद्वान् ज्योतिष्मान् इति उपास्ते, [सः] ह ज्योतिष्मतः लोकान् जयति ।
हिन्दी अर्थ
जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद की “ज्योतिष्मान्” के रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में ज्योतिष्मान् होता है। जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद की “ज्योतिष्मान्” के रूप में उपासना करता है, वह ज्योतिष्मान् लोकों को प्राप्त करता है।
English meaning
One who knows this and contemplates this four-part quarter of Brahman as Luminous becomes luminous in this world. One who knows this and contemplates this four-part quarter of Brahman as Luminous wins luminous worlds.
व्याख्या
ज्योतिष्मान् का अर्थ प्रकाश या तेज से युक्त है। पाठ उपासक और प्राप्त लोकों में उसी गुण की संगति बनाता है; उसे किसी मापने योग्य शारीरिक चमक की अनिवार्य गारंटी नहीं बनाया गया है।
Explanation
Jyotiṣmān means possessing light or brilliance. The passage aligns the contemplator and the worlds attained with that quality, rather than specifying a measurable physical glow.
संदर्भ
हंस का उपदेश प्रकाश के अनुरूप ध्यान-फल बताकर पूरा होता है।
Context
The swan’s teaching concludes with a result corresponding to luminosity.