Passage 149.3
स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳ ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः समित्पाणिः पुनः एयाय । प्रजापतिः तम् ह उवाच—मघवन्, यत् शान्तहृदयः प्राव्राजीः, किम् इच्छन् पुनः आगमः इति । सः ह उवाच—भगवः, तत् यद्यपि इदम् शरीरम् अन्धम् भवति, सः अनन्धः भवति; यदि [इदम् शरीरम्] स्रामम् [भवति], [सः] अस्रामः [भवति] । एषः अस्य दोषेण न एव दुष्यति ।
हिन्दी अर्थ
वह समिधाएँ हाथ में लिए फिर आया। प्रजापति ने पूछा, “मघवन्, तुम सन्तुष्ट मन से गए थे; अब किसकी इच्छा से लौटे हो?” उसने कहा, “भगवन्, यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है, वह स्वप्न वाला अन्धा नहीं होता; शरीर रोगग्रस्त हो तो वह रोगग्रस्त नहीं होता। यह उसके शारीरिक दोष से दूषित नहीं होता।”
English meaning
He returned with fuel sticks in his hand. Prajāpati asked, “Maghavan, you left content at heart. What do you desire that has brought you back?” He answered, “Sir, although this body may be blind, that dream-person is not blind; if the body is afflicted, he is not afflicted. He is not impaired by the body’s impairment.”
व्याख्या
यह कथन पिछले तर्क का पहला भाग है। अगले अनुच्छेद में स्वप्न का दुःख और गुरु का उत्तर आएगा; अर्थ को सुविधानुसार एक ही अनुच्छेद में नहीं मिलाया गया।
Explanation
This is the first part of the repeated argument. The next unit gives dream suffering and the teacher’s answer; the selected textual boundaries are not merged for convenience.
संदर्भ
स्वप्न सम्बन्धी विचार गुरु के सामने दोबारा प्रस्तुत होता है।
Context
The reflection on dream experience is restated before the teacher.