Passage 116.2
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः मनः ब्रह्म इति उपास्ते, यावत् मनसः गतम् [अस्ति], तत्र अस्य यथाकामचारः भवति—यः मनः ब्रह्म इति उपास्ते । [नारदः], भगवः, मनसः भूयः अस्ति इति [पप्रच्छ] । [सनत्कुमारः], मनसः वाव भूयः अस्ति इति [उवाच] । [नारदः], तत् मे भगवान् ब्रवीतु इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
जो मन को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, मन की जहाँ तक पहुँच है, वहाँ वह अपनी इच्छा के अनुसार विचरण कर सकता है; यह उस व्यक्ति के लिए है जो मन को ब्रह्म मानकर उपासना करता है। नारद ने पूछा: “भगवन्, क्या मन से भी बढ़कर कुछ है?” उत्तर मिला: “हाँ, मन से बढ़कर कुछ है।” नारद ने कहा: “भगवन्, वह मुझे बताइए।”
English meaning
One who contemplates mind as brahman has freedom to move as desired wherever mind extends. This applies to one who contemplates mind as brahman. Nārada asked, “Sir, is there anything greater than mind?” The answer was, “Indeed, there is something greater than mind.” Nārada said, “Sir, please tell me of it.”
व्याख्या
मन की उपासना का फल मन के क्षेत्र तक ही कहा गया है। इस प्रकार अगले चरण का आगमन पिछले चरण को व्यर्थ नहीं, सीमित बताता है।
Explanation
The result is coextensive with mind’s domain. The transition treats the preceding stage as limited, not useless.
संदर्भ
मन को केन्द्र मानने के बाद नारद उसके भी आगे की शिक्षा माँगते हैं।
Context
After contemplating mind as a center, Nārada asks for what lies beyond it.