Passage 87.2
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[त्वम्] अन्नम् अत्सि, प्रियम् पश्यसि । यः एतम् आत्मानम् वैश्वानरम् एवम् उपास्ते, [सः] अन्नम् अत्ति, प्रियम् पश्यति; अस्य कुले ब्रह्मवर्चसम् भवति । एषः तु आत्मनः प्राणः [अस्ति]; यत् माम् न आगमिष्यः, ते प्राणः उदक्रमिष्यत् इति ह उवाच ।
हिन्दी अर्थ
तुम अन्न खाते हो और प्रिय वस्तु देखते हो। जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है, वह अन्न खाता है, प्रिय वस्तु देखता है और उसके कुल में वैदिक विद्या का तेज होता है। राजा ने कहा, “किन्तु यह आत्मा का प्राण ही है। यदि तुम मेरे पास न आए होते, तो तुम्हारा प्राण निकल जाता।”
English meaning
You eat food and see what is dear. Whoever contemplates this Vaiśvānara self in this way eats food, sees what is dear, and has the radiance of sacred learning in the family. The king said, “But this is only the self’s vital breath. Had you not come to me, your vital breath would have departed.”
व्याख्या
वायु का जीवनगत पक्ष प्राण है। राजा फल को स्वीकार करके भी सम्पूर्ण आत्मा और उसके एक अंग का भेद रखते हैं। कथन ऐतिहासिक शिक्षा की भाषा में है, आज शारीरिक हानि की धमकी नहीं।
Explanation
Wind’s vital aspect is breath. The king acknowledges the benefit while distinguishing the whole self from one of its parts. This belongs to a historical teaching narrative, not a present-day threat of bodily injury.
संदर्भ
वायु की उपासना का फल स्वीकारते हुए राजा उसे सम्पूर्ण वैश्वानर का एक अंग बताते हैं।
Context
While acknowledging the benefit of contemplating wind, the king identifies it as one part of the complete Vaiśvānara.