Passage 74.15
न वै वाचो न चक्षूँषि न श्रोत्राणि न मनाँसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
वै वाचः [इति] न आचक्षते; चक्षूंषि [इति] न [आचक्षते]; श्रोत्राणि [इति] न [आचक्षते]; मनांसि इति न [आचक्षते] । प्राणाः इति एव आचक्षते । हि प्राणः एव एतानि सर्वाणि भवति ।
हिन्दी अर्थ
लोग इन्हें “वाणियाँ”, “आँखें”, “कान” या “मन” नहीं कहते; इन्हें “प्राण” ही कहते हैं, क्योंकि प्राण ही ये सब होता है।
English meaning
They do not call these “speeches,” “eyes,” “ears,” or “minds”; they call them simply “vital powers,” for vital breath itself becomes all of them.
व्याख्या
यह नामकरण का दार्शनिक तर्क है: अनेक शक्तियों में एक जीवनाधार कार्य करता है। इसे साधारण भाषा में इन अंगों के अलग नाम कभी न होने का दावा नहीं समझना चाहिए।
Explanation
This is a philosophical argument from collective naming: one vital support operates through several powers. It does not deny that ordinary language has separate names for the organs.
संदर्भ
कथा का निष्कर्ष सामान्य सामूहिक नाम प्राणाः की व्याख्या करता है।
Context
The story concludes by explaining the collective designation prāṇāḥ.