Passage 74.13
अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति ॥ १३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह वाक् एनम् उवाच—यत् अहम् वसिष्ठः अस्मि, त्वम् तत् वसिष्ठः असि इति । अथ ह चक्षुः एनम् उवाच—यत् अहम् प्रतिष्ठा अस्मि, त्वम् तत् प्रतिष्ठा असि इति ।
हिन्दी अर्थ
तब वाणी ने उससे कहा, “मैं जो वसिष्ठ, समृद्ध शक्ति हूँ, वह वसिष्ठता तुम्हारी ही है।” फिर आँख ने कहा, “मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, वह प्रतिष्ठा तुम्हारी ही है।”
English meaning
Speech then told it, “The rich endowment that makes me the most richly endowed belongs to you.” The eye then said, “The foundation that I am belongs to you.”
व्याख्या
यत्…तत् सम्बन्ध बताता है कि वाणी और आँख की विशिष्टता मिटती नहीं, बल्कि उसका जीवनाधार पहचाना जाता है। वसिष्ठ और प्रतिष्ठा के पूर्ववर्ती अर्थ यहाँ बनाए रखे गए हैं।
Explanation
The relative-correlative construction does not erase the special functions of speech and sight; it identifies their vital basis. The earlier meanings of rich endowment and foundation remain in force.
संदर्भ
वाणी और आँख अपनी आरम्भिक उपाधियों का आधार प्राण में स्वीकार करती हैं।
Context
Speech and sight acknowledge vital breath as the basis of their opening attributes.