Passage 43.1
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् यत् प्रथमम् अमृतम् [अस्ति], तत् वसवः अग्निना मुखेन उपजीवन्ति । वै देवाः न अश्नन्ति, न पिबन्ति; एतत् एव अमृतम् दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।
हिन्दी अर्थ
अब उस पहले अमृत पर वसु देवता अग्नि को मुख बनाकर जीवन धारण करते हैं। देवता न खाते हैं, न पीते हैं; वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं।
English meaning
The Vasus live on that first nectar, with Agni as their mouth. The gods do not eat or drink; they are satisfied simply by seeing this nectar.
व्याख्या
अग्नि का मुख होना देवसमूह के अग्रस्थान या माध्यम की छवि है। तृप्ति दृष्टि से होती है, भौतिक खाने-पीने से नहीं; यह बात मधु के रूपक को सामान्य आहार से स्पष्ट रूप से अलग करती है।
Explanation
Agni as the group’s mouth suggests a leading or mediating role. Satisfaction comes through seeing, explicitly not through physical eating and drinking, distinguishing this divine honey from ordinary food.
संदर्भ
पाँच अमृतों में पहले को अब वसु देवगण के साथ जोड़ा जाता है।
Context
The first of the five nectars is now related to the Vasus.