Passage 88.1
अथ होवाच जनँशार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ [सः] जनम् ह, शार्कराक्ष्य, त्वम् कम् आत्मानम् उपास्से इति उवाच । [सः], भगवः राजन्, आकाशम् एव [उपासे] इति ह उवाच । [सः], त्वम् यम् आत्मानम् उपास्से, एषः वै बहुलः आत्मा वैश्वानरः [अस्ति]; तस्मात् त्वम् प्रजया च धनेन च बहुलः असि [इति उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
फिर राजा ने जन से पूछा, “शार्कराक्ष्य, तुम किसे आत्मा मानकर उपासना करते हो?” उन्होंने कहा, “भगवन् राजन्, आकाश को ही।” राजा बोले, “जिसे तुम आत्मा मानकर उपासते हो, वह बहुल नाम वाला वैश्वानर आत्मा है। इसी से तुम सन्तान और धन, दोनों से बहुल हो।”
English meaning
The king next asked Jana, “Śārkarākṣya, what do you contemplate as the self?” He replied, “Space alone, revered king.” The king said, “The self you contemplate is Vaiśvānara called Bahula, the abundant. That is why you are abundant in both offspring and wealth.”
व्याख्या
बहुल मात्रा और विस्तार की समृद्धि दर्शाता है। प्रजा और धन अलग फल हैं; केवल “समृद्धि” कहकर दोनों को छिपाया नहीं गया है। यहाँ आकाश पहले के प्राण-दर्शन का पर्याय नहीं।
Explanation
Bahula conveys fullness and extent. Offspring and wealth are separate benefits and are not hidden under a single generic “prosperity.” Space is not treated here as simply another name for breath.
संदर्भ
चौथा उत्तर आकाश की व्यापकता को पारिवारिक समृद्धि से जोड़ता है।
Context
The fourth answer connects the breadth of space with household abundance.