Passage 35.1
विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
साम्नः विनर्दि पशव्यम् [गानम् अहम्] वृणे इति [यजमानः उद्गाता वा मन्यते] । [तत्] अग्नेः उद्गीथः [अस्ति] । प्रजापतेः अनिरुक्तः [उद्गीथः अस्ति]; सोमस्य निरुक्तः [उद्गीथः अस्ति] । वायोः मृदु श्लक्ष्णम् [गानम् अस्ति]; इन्द्रस्य श्लक्ष्णम् बलवत् [गानम् अस्ति]; बृहस्पतेः क्रौञ्चम् [गानम् अस्ति]; वरुणस्य अपध्वान्तम् [गानम् अस्ति] । तान् सर्वान् एव उपसेवेत; वारुणम् तु एव वर्जयेत् ।
हिन्दी अर्थ
“मैं साम का गम्भीर निनाद करने वाला, पशुधन के लिए हितकर गान चुनता हूँ”: यह अग्नि का उद्गीथ है। अस्पष्ट उच्चारण वाला प्रजापति का है; स्पष्ट वाला सोम का; कोमल और चिकना वायु का; चिकना और बलवान् इन्द्र का; क्रौञ्च-पक्षी जैसा बृहस्पति का; और टूटा-सा, कर्कश वरुण का है। इन सभी का प्रयोग करे, पर वरुण वाले को छोड़ दे।
English meaning
“I choose the resonant, bellowing Sāman that favours livestock”: this is Agni’s udgītha. The indistinct style belongs to Prajāpati; the clearly articulated to Soma; the soft and smooth to Vāyu; the smooth and forceful to Indra; the crane-like to Bṛhaspati; and the broken, harsh style to Varuṇa. One should employ all of them except the Varuṇa style.
व्याख्या
ये सात वर्णन गायन-शैली के हैं, आधुनिक स्वर-सप्तक के सात नोट नहीं। अपध्वान्तम् की ठीक ध्वनि विवादित है; अनुवाद टूटी और कर्कश ध्वनि का संकेत देता है।
Explanation
These seven descriptions concern vocal style, not the seven notes of a modern scale. The precise quality meant by apadhvāntam needs specialist judgment; the rendering suggests a broken, harsh sound.
संदर्भ
यह खण्ड गायक के स्वर, मानसिक संकल्प और वर्णोच्चारण को देवताओं तथा यज्ञफल से जोड़ता है।
Context
This section connects the singer’s vocal style, inward intentions and articulation with deities and sacrificial results.