Passage 60.1
सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किङ्गोत्रोन्वहमस्मीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
जाबालः सत्यकामः ह मातरम् जबालाम् आमन्त्रयाञ्चक्रे—भवति, [अहम्] ब्रह्मचर्यम् विवत्स्यामि; अहम् नु किङ्गोत्रः अस्मि इति ।
हिन्दी अर्थ
सत्यकाम जाबाल ने अपनी माता जबाला से कहा: “माता, मैं ब्रह्मचर्य के लिए गुरु के पास रहना चाहता हूँ। मैं किस गोत्र का हूँ?”
English meaning
Satyakāma Jābāla addressed his mother Jabālā: “Mother, I want to live as a student with a teacher. What is my lineage?”
व्याख्या
ब्रह्मचर्य यहाँ गुरु के साथ अनुशासित विद्यार्थी-जीवन है। भवति आदरसूचक सम्बोधन है, “होती है” क्रिया नहीं। गोत्र की जानकारी दीक्षा के प्रसंग में माँगी जा रही है।
Explanation
Brahmacarya here is disciplined student life with a teacher. Bhavati is a respectful form of address, not the verb “is.” Lineage becomes relevant in the setting of initiation.
संदर्भ
अध्याय अब सत्यकाम की शिक्षा और उसके गोत्र के प्रश्न की ओर मुड़ता है।
Context
The chapter now turns to Satyakāma’s education and the question of his lineage.