Passage 107.1
इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सोम्य, इमाः नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते; पश्चात् प्रतीच्यः [स्यन्दन्ते] । ताः समुद्रात् समुद्रम् एव अपियन्ति । सः [तासाम् जलराशिः] समुद्रः एव भवति । यथा ताः तत्र, इयम् अहम् अस्मि; इयम् अहम् अस्मि इति न विदुः ।
हिन्दी अर्थ
“प्रिय, ये नदियाँ पूर्व की ओर पूर्वमुखी और पश्चिम की ओर पश्चिममुखी बहती हैं। समुद्र से आकर वे समुद्र में ही लौट मिलती हैं; वह सब समुद्र ही हो जाता है। वहाँ वे यह नहीं जानतीं कि ‘मैं यह नदी हूँ, मैं वह नदी हूँ।’”
English meaning
“My dear, these rivers flow eastward toward the east and westward toward the west. From the sea they return into the sea; all becomes the sea itself. There they do not know, ‘I am this river; I am that river.’”
व्याख्या
समुद्र से समुद्र तक जाने का कथन मूल का भाग है; उसमें आधुनिक जलचक्र का विस्तृत विवरण नहीं जोड़ा गया। पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाएँ तथा दो अलग आत्म-पहचान वाले वाक्य बनाए रखे गए हैं।
Explanation
The movement from sea to sea is retained as stated, without adding a detailed modern water cycle. Both east and west directions and both separate self-identifications remain explicit.
संदर्भ
नदियों का उदाहरण अनेक धाराओं के एक समुद्र में मिलने को दिखाता है।
Context
The rivers illustrate many streams joining a single sea.