Passage 129.1
एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः सत्येन अतिवदति, एषः तु वा अतिवदति । [नारदः], भगवः, सः अहम् सत्येन अतिवदानि इति [उवाच] । [सनत्कुमारः], सत्यम् तु एव विजिज्ञासितव्यम् इति [उवाच] । [नारदः], भगवः, सत्यम् विजिज्ञासे इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
“किन्तु वास्तव में वही अतिवादी है जो सत्य के आधार पर आगे की बात कहता है।” नारद ने कहा: “भगवन्, मैं सत्य के आधार पर अतिवादी बनूँ।” सनत्कुमार ने कहा: “तब सत्य को ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए।” नारद ने कहा: “भगवन्, मैं सत्य को जानना चाहता हूँ।”
English meaning
“But the one who truly speaks beyond is the one who does so through truth.” Nārada said, “Sir, may I speak beyond through truth.” Sanatkumāra replied, “Then truth itself must be sought and understood.” Nārada said, “Sir, I wish to understand truth.”
व्याख्या
तु पिछले निष्कर्ष पर नया भेद रखता है। अब संवाद वस्तुओं की श्रृंखला से सत्य को जानने की आवश्यक शर्तों की खोज में बदलता है। अतिवदानि इच्छा या संकल्प का प्रथम-पुरुष प्रयोग है।
Explanation
Tu introduces a qualification of the preceding conclusion. The dialogue shifts from a sequence of objects to inquiry into the conditions for understanding truth. Ativadāni expresses a first-person aspiration.
संदर्भ
प्राण के बाद नारद के “क्या इससे बढ़कर?” पूछने से पहले ही गुरु अतिवाद को सत्य से जोड़ते हैं।
Context
After life-breath, the teacher himself links ativāda with truth, without waiting for the earlier “something greater?” formula.