Passage 151.1
मघवन्मर्त्यं वा इदꣳ शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
मघवन्, इदम् शरीरम् वै मर्त्यम् मृत्युना आत्तम् [अस्ति] । तत् अस्य अमृतस्य अशरीरस्य आत्मनः अधिष्ठानम् [अस्ति] । सशरीरः वै प्रियाप्रियाभ्याम् आत्तः [अस्ति]; सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोः अपहतिः वै न अस्ति । अशरीरम् वाव सन्तम् प्रियाप्रिये न स्पृशतः ।
हिन्दी अर्थ
“मघवन्, यह शरीर मर्त्य है और मृत्यु के अधीन है। यह अमृत, अशरीर आत्मा का आश्रय है। शरीर से युक्त व्यक्ति प्रिय और अप्रिय के अधीन रहता है। जब तक वह शरीर से युक्त है, तब तक प्रिय और अप्रिय से पूर्ण छुटकारा नहीं है। पर अशरीर अवस्था में उसे प्रिय और अप्रिय नहीं छूते।”
English meaning
“Maghavan, this body is mortal and held in the power of death. It is the dwelling of the immortal, bodiless self. One who is embodied is subject to the pleasant and the unpleasant. While embodied, one is not free of the pleasant and the unpleasant. But the pleasant and the unpleasant do not touch one who is bodiless.”
व्याख्या
अशरीर को कुछ व्याख्याएँ शरीरान्त के बाद की दशा, कुछ देहाभिमान से मुक्ति के रूप में समझती हैं। यहाँ दोनों सम्भावनाओं को खुला रखा गया है। यह शरीर की उपेक्षा या उसे हानि पहुँचाने का निर्देश नहीं।
Explanation
Some interpretations understand bodilessness as a state beyond bodily death, others as freedom from identification with the body. The translation leaves these possibilities open. It is not an instruction to neglect or harm the body.
संदर्भ
अन्तिम शिक्षा नश्वर शरीर और अशरीर आत्मा का भेद स्पष्ट करती है।
Context
The final instruction distinguishes the mortal body from the bodiless self.