Passage 53.1
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विꣳशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विꣳशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदꣳसर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
पुरुषः वाव यज्ञः [अस्ति] । तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि [सन्ति], तत् प्रातःसवनम् [अस्ति] । गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा [अस्ति]; प्रातःसवनम् गायत्रम् [अस्ति] । अस्य तत् वसवः अन्वायत्ताः [सन्ति] । प्राणाः वाव वसवः [सन्ति]; हि एते इदम् सर्वम् वासयन्ति ।
हिन्दी अर्थ
मनुष्य ही यज्ञ है। उसके जीवन के जो पहले चौबीस वर्ष हैं, वे उसका प्रातःसवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरों वाली है और प्रातःसवन गायत्री से सम्बद्ध है। उसके इस सवन से वसु जुड़े हैं। प्राण ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस समस्त जगत् को बसाते और टिकाते हैं।
English meaning
The human being is a sacrifice. The first twenty-four years of life are the morning pressing. Gāyatrī has twenty-four syllables, and the morning pressing belongs to Gāyatrī. The Vasus are associated with this pressing. The vital powers are the Vasus, for they make all this dwell.
व्याख्या
वर्षों की संख्या छन्द के अक्षरों से मिलायी गयी है। तीनों चरण 24 + 44 + 48 = 116 वर्ष का आदर्श जीवन बनाते हैं। वसु और बसाते और टिकाते हैं का सम्बन्ध वैदिक शब्दार्थ-ध्यान है, आधुनिक वैज्ञानिक व्युत्पत्ति या जीवनावधि की गारंटी नहीं।
Explanation
The years correspond to the meter’s syllable count. The three stages form an ideal life of 24 + 44 + 48 = 116 years. The relationship between Vasus and the stated action is a Vedic verbal contemplation, not a modern scientific etymology or guaranteed lifespan.
संदर्भ
जीवन-यज्ञ का पहला चरण चौबीस वर्षों, गायत्री छन्द और वसु देवताओं को जोड़ता है।
Context
The first stage of the life-sacrifice joins twenty-four years with the Gāyatrī meter and the Vasus.