Passage 17.1
सर्वास्वप्सु पञ्चविधꣳ सामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिङ्कारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सर्वासु अप्सु पञ्चविधम् साम उपासीत । यत् मेघः संप्लवते, सः हिङ्कारः [अस्ति] । यत् वर्षति, सः प्रस्तावः [अस्ति] । याः प्राच्यः स्यन्दन्ते, सः उद्गीथः [अस्ति] । याः प्रतीच्यः [स्यन्दन्ते], सः प्रतिहारः [अस्ति] । समुद्रः निधनम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
सभी जलों में पाँच अंगों वाले साम की उपासना करे: बादल का एकत्र होकर बहना हिङ्कार है; वर्षा होना प्रस्ताव है; पूर्व की ओर बहने वाले जल उद्गीथ हैं; पश्चिम की ओर बहने वाले प्रतिहार हैं; समुद्र निधन है।
English meaning
One should contemplate the five-part Sāman in all waters: the gathering and movement of a cloud is hiṅkāra; rainfall is prastāva; eastward-flowing waters are udgītha; westward-flowing waters are pratihāra; the ocean is nidhana.
व्याख्या
पूर्व और पश्चिम की ओर बहने वाले जलों का उल्लेख है; किसी विशेष नदी का नाम नहीं दिया गया। समुद्र प्रवाहों के समापन का प्रतीक बनता है।
Explanation
The text names eastward and westward flows without identifying particular rivers. The ocean represents the convergence and conclusion of those movements.
संदर्भ
यह खण्ड जल के विभिन्न रूपों और प्रवाहों को साम के पाँच अंगों से जोड़ता है।
Context
This section links different forms and movements of water with the five portions of the Sāman.