Passage 132.1
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यदा वै श्रद्दधाति, अथ मनुते । अश्रद्दधन् न मनुते; श्रद्दधत् एव मनुते । [सनत्कुमारः], श्रद्धा तु एव विजिज्ञासितव्या इति [उवाच] । [नारदः], भगवः, श्रद्धाम् विजिज्ञासे इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
“जब मनुष्य श्रद्धा रखता है, तभी मनन करता है। श्रद्धा न रखकर मनन नहीं करता; श्रद्धा रखकर ही मनन करता है। इसलिए श्रद्धा को ही विशेष रूप से जानना चाहिए।” नारद ने कहा: “भगवन्, मैं श्रद्धा को जानना चाहता हूँ।”
English meaning
“When one has trust, one reflects. Without trust one does not reflect; with trust one does reflect. Therefore trustful commitment, śraddhā, itself must be sought and understood.” Nārada said, “Sir, I wish to understand śraddhā.”
व्याख्या
श्रद्धा को ऐसी भरोसेभरी प्रतिबद्धता समझा गया है जिससे व्यक्ति शिक्षा पर ध्यान देता है। इसे बिना विचार हर कथन मान लेने का आदेश नहीं बनाया गया, क्योंकि उसी के फल के रूप में मनन बताया जा रहा है।
Explanation
Śraddhā is understood as the trusting commitment through which one attends to teaching. It is not recast as an order to accept every claim without thought, since reflection is precisely what it is said to enable.
संदर्भ
मनन को सम्भव बनाने वाली ग्रहणशील श्रद्धा का प्रसंग आता है।
Context
The inquiry turns to the receptive trust that supports reflection.