Passage 105.1
उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनँ स्वपितीत्याचक्षते स्वँह्यपीतो भवति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
उद्दालकः आरुणिः ह श्वेतकेतुम् पुत्रम्, सोम्य, मे [निगदतः] स्वप्नान्तम् विजानीहि इति उवाच । सोम्य, यत्र एतत् पुरुषः स्वपिति नाम, तदा सता सम्पन्नः भवति; स्वम् अपीतः भवति । तस्मात् एनम् स्वपिति इति आचक्षते; स्वम् हि अपीतः भवति ।
हिन्दी अर्थ
उद्दालक आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा, “प्रिय, मुझसे नींद की अवस्था समझो। जब किसी मनुष्य के विषय में कहते हैं कि वह सोता है, तब वह सत् से संयुक्त होता है; वह अपने स्वरूप में पहुँचा होता है। इसलिए उसे ‘स्वपिति’ कहते हैं, क्योंकि वह अपने में ही पहुँचा होता है।”
English meaning
Uddālaka Āruṇi said to his son Śvetaketu, “My dear, learn from me about the state of sleep. When a person is said to sleep, he has then become united with Being and entered into his own. That is why they call him svapiti, ‘he sleeps’: he has entered into his own.”
व्याख्या
स्वपिति को स्वम् और अपीतः से जोड़ना पाठ की अर्थपरक व्युत्पत्ति है, आधुनिक ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की सिद्धि नहीं। स्वप्नान्त नींद की अवस्था, विशेषतः स्वप्नों के शान्त हो जाने की अवस्था, समझा जा सकता है।
Explanation
The connection of svapiti with svam and apītaḥ is the text’s interpretive etymology, not a demonstration of modern historical linguistics. Svapnānta can denote the condition of sleep, especially the state in which dreams have subsided.
संदर्भ
पिता अब नींद को अपने आधार तक लौटने के उदाहरण के रूप में लेते हैं।
Context
The father now takes sleep as an example of returning to one’s ground.