Passage 3.1
अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति । उद्यꣳ स्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ अधिदैवतम् [उच्यते] । यः एव असौ तपति, तम् उद्गीथम् उपासीत । एषः वै उद्यन् प्रजाभ्यः उद्गायति; उद्यन् तमः भयम् [च] अपहन्ति । यः एवम् वेद, [सः] भयस्य तमसः अपहन्ता ह वै भवति ।
हिन्दी अर्थ
अब देवता के सन्दर्भ में: जो वहाँ तपता है, उस सूर्य को उद्गीथ मानकर उपासे। उदित होते हुए वह प्रजाओं के लिए उद्गान करता है। उदित होते हुए वह अन्धकार और भय को दूर करता है। जो इस प्रकार जानता है, वह भय और अन्धकार को दूर करने वाला होता है।
English meaning
Now with reference to the divine: one should contemplate the sun that shines above as the udgītha. Rising, it sings upward for living beings; rising, it dispels darkness and fear. One who knows this becomes a dispeller of fear and darkness.
व्याख्या
अधिदैवत दृष्टि देह की किसी शक्ति के समानान्तर विश्व की देवता-सम्बद्ध शक्ति को रखती है। उद्गायति का सूर्य पर प्रयोग एक उपासना-रूपक है, सूर्य से सामान्य श्रव्य संगीत निकलने का खगोलशास्त्रीय दावा नहीं। भय का अपहरण भी इसी प्रतीक और फल-वचन के भीतर है।
Explanation
The divine perspective places a cosmic power alongside a bodily faculty. Applying udgāyati to the sun is a contemplative image, not an astronomical claim that the sun produces ordinary audible song. The removal of fear belongs to the same symbolic and promised benefit.
संदर्भ
भीतर के प्राण से आरम्भ हुआ विवेचन अब बाहर सूर्य की ओर मुड़ता है। उदित होना और उद्गान करना ध्वनि तथा अर्थ से जोड़े गए हैं।
Context
The discussion turns from the inner vital breath to the sun outside. Rising and singing upward are connected through sound and meaning.