Passage 2.9
नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
एतेन [मुख्यप्राणेन लोकः] सुरभि न एव, दुर्गन्धि न विजानाति । एषः हि अपहतपाप्मा [अस्ति] । [लोकः] तेन यत् अश्नाति, यत् पिबति, तेन [अशितेन पीतेन मुख्यप्राणः] इतरान् प्राणान् अवति । एतम् उ एव [मुख्यप्राणम्, तस्य अन्नपानवृत्तिम्] अन्ततः अवित्त्वा [घ्राणादिप्राणसमुदायः] उत्क्रामति; अन्ततः [पुरुषः आस्यम्] व्याददाति एव इति ।
हिन्दी अर्थ
इस मुख्य प्राण से न सुगन्ध जानी जाती है, न दुर्गन्ध, क्योंकि यह दोष से मुक्त है। इसके सहारे जो खाया-पीया जाता है, उससे यह अन्य प्राणों की रक्षा करता है। अन्त में इसकी पोषक क्रिया उपलब्ध न रहने पर वे प्राण निकल जाते हैं; अन्त में मुँह खुल जाता है।
English meaning
Through this chief breath one does not distinguish pleasant or foul odours, for it is free from evil. With what is eaten and drunk through it, it sustains the other vital faculties. At the end, when its sustaining activity is no longer available, those faculties depart; at the end the mouth opens.
व्याख्या
अन्य प्राण यहाँ घ्राण आदि जीवन-क्षमताओं को कहते हैं। अन्तिम वाक्य के संक्षिप्त सर्वनाम और कर्ता को समझने में संस्कृत भाष्य की सहायता ली गई है: प्राण की अन्न-पान-सम्बन्धी क्रिया न मिलने पर इन्द्रिय-समुदाय का प्रस्थान। यह प्राचीन जीवन-वर्णन है, मृत्यु का चिकित्सकीय निदान करने की विधि नहीं।
Explanation
The other prāṇas are vital faculties such as smell. The Sanskrit commentary helps resolve the compressed pronoun and subject in the final sentence: the faculties depart when the chief breath’s nourishing activity is unavailable. This is an ancient account of life, not a clinical procedure for determining death.
संदर्भ
यह अनुच्छेद मुख्य प्राण को घ्राण से अलग करके उसकी पोषणकारी भूमिका बताता है। अन्त में जीवन-क्रियाओं के समाप्त होने का एक दृश्य दिया गया है।
Context
This passage distinguishes the chief breath from smell and explains its sustaining role. It closes with an image of the cessation of vital activity.