Passage 75.8
निर्णिज्य कँसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत्समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ८ ॥
पदच्छेद
अन्वय
कंसम् चमसम् वा निर्णिज्य अग्नेः पश्चात् चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमः अप्रसाहः [सन्] संविशति । सः यदि स्त्रियम् पश्येत्, [तदा] कर्म समृद्धम् [अस्ति] इति विद्यात् ।
हिन्दी अर्थ
काँसे के पात्र या चमस को धोकर अग्नि के पश्चिम में, चमड़े पर या समतल भूमि पर लेट जाए; वाणी को रोके रखे और दबाव डालने वाला न हो। यदि उसे स्वप्न में स्त्री दिखाई दे, तो वह जाने कि कर्म सफल हुआ।
English meaning
After rinsing the bowl or ladle, lie down west of the fire, either on a hide or on level ground, restraining speech and without pressing or exerting oneself. If a woman appears in a dream, one should take the rite to have succeeded.
व्याख्या
अप्रसाहः का सटीक अनुष्ठानिक आशय अनिश्चित है; उसे अनावश्यक क्रिया या बल-प्रयोग से विरत रहने के रूप में समझा गया है। स्वप्न का अर्थ अगले पद से स्पष्ट होता है। यह सफलता का प्राचीन शकुन है, विश्वसनीय भविष्यवाणी का दावा नहीं।
Explanation
The precise ritual sense of aprasāhaḥ is uncertain; it is understood here as refraining from exertion or force. The following passage makes the dream setting explicit. The omen belongs to the ancient rite and is not offered as a reliable prediction.
संदर्भ
पेय के बाद मौन विश्राम और स्वप्न-लक्षण का विधान आता है।
Context
After drinking come silent repose and a dream omen.