Passage 75.2
स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह उवाच—मे किम् वासः भविष्यति इति । [इतरे प्राणाः] ह ऊचुः—आपः इति । तस्मात् वा एतत् अशिष्यन्तः पुरस्तात् च उपरिष्टात् च अद्भिः परिदधति । [एवम् विद्] ह वासः लम्भुकः भवति; [सः] ह अनग्नः भवति ।
हिन्दी अर्थ
उसने पूछा, “मेरा वस्त्र क्या होगा?” उन्होंने कहा, “जल।” इसीलिए भोजन करने वाले भोजन से पहले और बाद में जल से उसे घेरते हैं। इस ज्ञान वाला वस्त्र प्राप्त करता है और नग्न नहीं रहता।
English meaning
It asked, “What will be my clothing?” They answered, “Water.” That is why people about to eat surround it with water before and afterward. One with this knowledge obtains clothing and does not remain unclothed.
व्याख्या
पुरस्तात् और उपरिष्टात् यहाँ भोजन के पहले और बाद को सूचित करते हैं। वस्त्र-प्राप्ति उपासना का घोषित फल है; पाठ जल को वास्तविक कपड़े का भौतिक विकल्प नहीं बनाता।
Explanation
Here “before” and “after” refer to the meal. Obtaining clothing is a stated contemplative benefit; water is not being proposed as a physical substitute for garments.
संदर्भ
जल को प्राण का आवरण बताकर भोजन से जुड़ी जल-क्रिया का अर्थ दिया जाता है।
Context
Water is identified as breath’s covering, explaining the water rite around a meal.