Passage 7.4
अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम तस्मादृच्यध्यूढꣳ साम गीयते अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यत् एतत् अक्ष्णः शुक्लम् भाः [अस्ति], सा एव ऋक् [अस्ति] । अथ यत् नीलम् परः कृष्णम् [अस्ति], तत् साम [अस्ति] । तत् एतत् साम एतस्याम् ऋचि अध्यूढम् [अस्ति] । तस्मात् ऋचि अध्यूढम् साम गीयते । अथ यत् एव एतत् अक्ष्णः शुक्लम् भाः [अस्ति], सा एव सा [अस्ति] । अथ यत् नीलम् परः कृष्णम् [अस्ति], तत् अमः [अस्ति] । तत् साम [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
अब नेत्र की जो श्वेत दीप्ति है, वही ऋक् है; और जो नीला, अत्यन्त गहरा कृष्ण भाग है, वह साम है। यह साम इस ऋक् पर अधिष्ठित है; इसीलिए ऋक् पर अधिष्ठित साम गाया जाता है। नेत्र की वही श्वेत दीप्ति “सा” है और जो नीला, अत्यन्त गहरा कृष्ण भाग है, वह “अम”; दोनों मिलकर “साम” हैं।
English meaning
Now, the eye’s white radiance is the ṛc, while what is blue and intensely dark is the Sāman. This Sāman rests upon that ṛc; therefore a Sāman is sung resting upon a ṛc. That white radiance is “sā,” and what is blue and intensely dark is “ama”; together they are “sāma.”
व्याख्या
यह अनुच्छेद बाहर के सूर्य और भीतर के नेत्र के बीच निकट साम्य तैयार करता है। श्वेत–गहरे वर्ण को पहले ऋक्–साम और फिर “सा”–“अम” कहा गया है, इसलिए दोनों वाक्य आवश्यक हैं। यह नेत्र के वर्ण-रूप का अनुष्ठानिक उपयोग है; मनुष्यों की आँखों के सभी रंगों का एक समान जैविक वर्गीकरण नहीं।
Explanation
This passage prepares a close correspondence between the outer sun and the inner eye. White and dark are first identified as ṛc and Sāman, then as “sā” and “ama,” so both formulations have a function. The eye’s appearance is used for contemplation; it is not a universal biological classification of human eye colors.
संदर्भ
सूर्य के श्वेत और गहरे वर्ण का पहले बताया गया ध्यान अब नेत्र के प्रकाशमान और गहरे भागों में दोहराया जाता है।
Context
The earlier contemplation of white and dark in the sun is repeated in the bright and dark portions of the eye.