Passage 59.6
स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह उवाच—भुवनस्य गोपाः एकः देवः चतुरः महात्मनः जगार; सः कः [अस्ति] । कापेय, अभिप्रतारिन्, मर्त्याः बहुधा वसन्तम् तम् न अभिपश्यन्ति । यस्मै वा एतत् अन्नम् [अस्ति], तस्मै एतत् न दत्तम् इति ।
हिन्दी अर्थ
उसने कहा: “एक देव, जगत् का रक्षक, चार महात्माओं को निगल गया; वह कौन है? कापेय और अभिप्रतारिन्, अनेक रूपों में रहने वाले उसे मरणशील लोग नहीं देख पाते। यह अन्न जिसके लिए है, उसी को यह नहीं दिया गया।”
English meaning
He said, “One deity, the guardian of the world, swallowed four great ones. Who is he? Kāpeya, Abhipratārin, mortals do not discern him as he dwells in many forms. The very one for whom this food is meant has not been given it.”
व्याख्या
चार को समेटने वाला एक वायु अथवा प्राण है: पहले बताए हुए बाह्य और आन्तरिक समूह इसकी पृष्ठभूमि हैं। अन्त में “नहीं दिया गया” निर्णायक है। भिक्षार्थी में भी उपस्थित जीवन-शक्ति की उपेक्षा को यह वाक्य उजागर करता है।
Explanation
The one who absorbs four points back to air or vital breath and their corresponding groups. The final negation is essential: the food has not been given to the power also present in the hungry student.
संदर्भ
ब्रह्मचारी पहेली के रूप में संवर्गविद्या को उनके भोजन और अपनी उपेक्षा से जोड़ता है।
Context
The student turns the doctrine of absorption into a riddle about their meal and his exclusion.