Passage 59.5
अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह ब्रह्मचारी परिविष्यमाणौ कापेयम् शौनकम् च काक्षसेनिम् अभिप्रतारिणम् च बिभिक्षे । तस्मै उ ह [तौ] न ददतुः ।
हिन्दी अर्थ
एक बार शौनक कापेय और अभिप्रतारिन् काक्षसेनि को भोजन परोसा जा रहा था। एक ब्रह्मचारी ने उनसे भिक्षा माँगी, पर उन दोनों ने उसे कुछ नहीं दिया।
English meaning
Once, while Śaunaka Kāpeya and Abhipratārin Kākṣaseni were being served food, a student asked them for alms. They did not give him any.
व्याख्या
परिविष्यमाणौ दोनों व्यक्तियों के भोजन परोसे जाने को बताता है; ब्रह्मचारी को उसी समय मना किया जाता है। अगला मन्त्र इस अस्वीकार और उनके उपास्य के बीच विरोध सामने रखता है।
Explanation
The dual participle describes the two men being served. Their refusal to the student prepares the challenge about whom their food ultimately belongs to.
संदर्भ
संवर्गविद्या के बाद भोजन और भिक्षा से जुड़ा एक संवाद उसी शिक्षा को व्यवहार से जोड़ता है।
Context
A scene involving food and alms brings the teaching of absorption into a social encounter.