Passage 59.3
अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणꣳ श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ अध्यात्मम्—प्राणः वाव संवर्गः [अस्ति] । सः यदा स्वपिति, [तदा] वाक् प्राणम् एव अप्येति; चक्षुः प्राणम् [अप्येति]; श्रोत्रम् प्राणम् [अप्येति]; मनः प्राणम् [अप्येति] । हि प्राणः एव एतान् सर्वान् संवृङ्क्ते इति ।
हिन्दी अर्थ
“अब व्यक्ति के भीतर की दृष्टि से: प्राण ही संवर्ग है। जब व्यक्ति सोता है, वाणी प्राण में ही लीन होती है, आँख प्राण में, कान प्राण में और मन प्राण में। प्राण ही इन सबको अपने में समेट लेता है।”
English meaning
“Now with reference to the individual: vital breath is the absorber. When a person sleeps, speech passes into breath, sight into breath, hearing into breath, and mind into breath. Breath gathers all these into itself.”
व्याख्या
निद्रा में बोलना और जाग्रत इन्द्रिय-व्यापार रुकते हैं, जबकि श्वास बनी रहती है; उपासना इसी अनुभव पर बल देती है। इसे सभी मानसिक क्रियाओं के चिकित्सकीय रूप से बन्द होने का कथन नहीं समझना चाहिए।
Explanation
Sleep suspends speech and ordinary waking activity while breathing continues. The contemplation draws on that contrast, not on a medical claim that every sensory or mental process ceases.
संदर्भ
बाहरी वायु के समान भीतर के प्राण का समाहार-स्वरूप बताया जाता है।
Context
The inward role of breath is placed alongside the outward role of air.