Passage 104.6
एवँ सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीतयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयँहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सोम्य, एवम् ते षोडशानाम् कलानाम् एका कला अतिशिष्टा अभूत्; सा अन्नेन उपसमाहिता प्राज्वाली । तया एतर्हि [त्वम्] वेदान् अनुभवसि । सोम्य, मनः हि अन्नमयम् [अस्ति]; प्राणः आपोमयः [अस्ति]; वाक् तेजोमयी [अस्ति] इति । [सः] तत् ह अस्य [पितुः उक्तम्] विजज्ञौ इति; विजज्ञौ इति ।
हिन्दी अर्थ
“प्रिय, इसी प्रकार तुम्हारी सोलह कलाओं में से एक कला बची थी। अन्न से पोषित होकर वह फिर प्रज्वलित हुई। उसी से अब तुम वेदों को स्मरण कर रहे हो। क्योंकि, प्रिय, मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है।” उसने उनकी यह बात समझ ली, हाँ, समझ ली।
English meaning
“My dear, in the same way one of your sixteen parts had remained. Nourished by food, it blazed up again. Through it you now recall the Vedas. For, my dear, mind is made of food, vital breath of water, and speech of heat.” He understood this teaching of his father. Indeed, he understood it.
व्याख्या
कथा अन्न से पोषण को अंगारे में ईंधन देने के समान रखती है। अन्त में तीनों मूल सम्बन्ध फिर कहे गए हैं। विजज्ञौ की पुनरावृत्ति पाठ का हिस्सा है, अनावश्यक दोहराव मानकर हटाई नहीं गई।
Explanation
The narrative compares nourishment through food to fuel supplied to an ember. All three original relations are repeated, and the closing repetition of vijajñau is retained rather than treated as redundant.
संदर्भ
अन्न और मन की चर्चा समझ आने की दोहरी पुष्टि पर समाप्त होती है।
Context
The discussion of food and mind closes with a doubled affirmation of understanding.