Passage 76.5
पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकञ्चन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
राजन्यबन्धुः मा पञ्च प्रश्नान् अप्राक्षीत् । तेषाम् एकञ्चन विवक्तुम् न अशकम् इति [श्वेतकेतुः आह] । सः [पिता] ह उवाच—यथा मा त्वम् तदा एतान् अवदः, [तथा मा जानीहि], यथा अहम् एषाम् एकञ्चन न वेद । यदि अहम् इमान् अवेदिष्यम्, ते कथम् न अवक्ष्यम् इति ।
हिन्दी अर्थ
“उस राजन्य-वंशी व्यक्ति ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे; उनमें एक का भी उत्तर मैं न दे सका।” पिता ने कहा, “जैसा तुमने उस समय मुझे ये प्रश्न बताए, वैसे ही समझो कि मैं भी इनमें एक को नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता, तो तुम्हें क्यों न बताता?”
English meaning
“That man of royal lineage asked me five questions, and I could not explain even one of them.” His father said, “As you have now told me these questions, understand that I too know not a single one. If I had known them, why would I not have told you?”
व्याख्या
राजन्यबन्धु में वंश-परिचय के साथ श्वेतकेतु की खिन्नता का भाव भी सुनाई दे सकता है। उत्तर में पिता जानबूझकर शिक्षा रोकने से इनकार करते हैं।
Explanation
Rājanyabandhu identifies royal lineage and may also carry Śvetaketu’s irritated tone. His father denies that he deliberately withheld the teaching.
संदर्भ
पिता अपनी अज्ञान-सीमा स्वीकार करके सीखने की दिशा खोलते हैं।
Context
The father acknowledges the limit of his knowledge and opens the way to further learning.