Passage 76.3
वेत्थ यथासौ लोको न सम्पूर्यत३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति नैव भगव इति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[प्रवाहणः पप्रच्छ—] यथा असौ लोकः न सम्पूर्यत३, [तत्] वेत्थ इति । [श्वेतकेतुः आह—] भगवः, न [वेद] इति । [प्रवाहणः पप्रच्छ—] यथा पञ्चम्याम् आहुतौ आपः पुरुषवचसः भवन्ति, [तत्] वेत्थ इति । [श्वेतकेतुः आह—] भगवः, न एव [वेद] इति ।
हिन्दी अर्थ
“क्या तुम जानते हो कि वह लोक भर क्यों नहीं जाता?” “नहीं, भगवन्।” “क्या तुम जानते हो कि पाँचवीं आहुति में जल कैसे ‘पुरुष’ नाम वाला हो जाता है?” “नहीं ही, भगवन्।”
English meaning
“Do you know why that other world does not become full?” “No, revered sir.” “Do you know how, at the fifth offering, the waters come to be called a human being?” “No indeed, revered sir.”
व्याख्या
पुरुषवचसः का अर्थ मनुष्य के नाम से अभिहित होना है। पाँच आहुतियों की क्रमिक प्रतीक-व्यवस्था आगे स्पष्ट होगी; यहाँ आधुनिक शरीर-विज्ञान का दावा नहीं किया गया है।
Explanation
Puruṣavacasaḥ means bearing the designation “human.” The sequence of five symbolic offerings will explain this expression; the question is not a claim of modern physiology.
संदर्भ
चौथा और पाँचवाँ प्रश्न लोकों की गति को मानव-जन्म से जोड़ते हैं।
Context
The fourth and fifth questions connect movement between worlds with human birth.