Passage 57.7
स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तꣳ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमर्च्छेति ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह क्षत्ता अन्विष्य न अविदम् इति प्रत्येयाय । [जानश्रुतिः] तम् ह उवाच—अरे, यत्र ब्राह्मणस्य अन्वेषणा [भवति], तत् एनम् अर्च्छ इति ।
हिन्दी अर्थ
वह परिचारक खोजकर लौटा और बोला: “मुझे वह नहीं मिला।” जानश्रुति ने उससे कहा: “अरे, जहाँ किसी ब्रह्मज्ञानी को ढूँढ़ा जाता है, वहाँ जाकर उसे खोजो।”
English meaning
The attendant searched and returned, saying, “I did not find him.” Jānaśruti told him, “Go where one would look for a brahmin, a knower of sacred truth, and seek him there.”
व्याख्या
ब्राह्मण शब्द का अर्थ यहाँ विद्या और ब्रह्मचिन्तन के सन्दर्भ में लिया गया है, पर संस्कृत का सामाजिक पद भी बना रहता है। पाठ किसी निश्चित वन, नगर या आश्रम का नाम नहीं देता।
Explanation
Brāhmaṇa is understood here in relation to sacred learning, without erasing the Sanskrit term’s social significance. The text does not name a particular forest, town or monastery.
संदर्भ
रैक्व की पहली खोज विफल होती है और जानश्रुति खोज की दिशा बदलता है।
Context
The first search fails, and Jānaśruti redirects the attendant.