Passage 57.2
अथ हꣳसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवꣳ हꣳसोहꣳ समभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ हंसाः निशायाम् अतिपेतुः । तत् ह एवम् हंसः हंसम् अभ्युवाद—हो हो अयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष, पौत्रायणस्य जानश्रुतेः ज्योतिः दिवा समम् आततम् [अस्ति] । तत् मा प्रसाङ्क्षीः; तत् त्वा मा प्रधाक्षीः इति ।
हिन्दी अर्थ
तब रात में कुछ हंस ऊपर से उड़ गए। उनमें एक हंस ने दूसरे हंस को इस प्रकार पुकारा: “हो, हो! अरे भल्लाक्ष, भल्लाक्ष! जानश्रुति पौत्रायण का तेज आकाश तक फैला है। उससे मत टकराना; वह तुम्हें झुलसा न दे।”
English meaning
Then swans flew overhead at night. One swan called to another, “Ho, ho! Bhallākṣa, Bhallākṣa! The radiance of Jānaśruti Pautrāyaṇa extends as far as heaven. Do not run into it, lest it scorch you.”
व्याख्या
दिवा को यहाँ दिव्, आकाश या स्वर्ग, से सम्बन्धित रूप में लिया गया है, केवल “दिन में” नहीं। हंस का कथन कथा के भीतर प्रशंसा और चेतावनी है; इसे भौतिक विकिरण का विवरण नहीं समझना चाहिए।
Explanation
Divā is read here with div, heaven or sky, rather than simply as “by day.” The swan’s warning dramatizes merit as radiance; it is not a physical account of radiation.
संदर्भ
जानश्रुति के दान की ख्याति हंसों के काल्पनिक संवाद में तेज के रूप में व्यक्त होती है।
Context
The swans’ dialogue expresses the reach of Jānaśruti’s reputation through the image of radiance.