Passage 57.4
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनꣳसर्वं तदभिसमैति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यथा विजिताय कृताय अधरे अयाः संयन्ति, एवम् प्रजाः यत् किम् च साधु कुर्वन्ति, तत् सर्वम् एनम् अभिसमैति । यत् सः वेद, तत् यः वेद, सः मया एतत् उक्तः इति ।
हिन्दी अर्थ
“जैसे जीते हुए कृत नामक सर्वोच्च पासे में नीचे के पासों के फल समा जाते हैं, वैसे ही लोग जो भी अच्छा करते हैं, वह सब उस रैक्व में आ मिलता है। जो वह जानता है, उसे जो जानता है, उसी के विषय में मैंने यह कहा है।”
English meaning
“Just as the lower throws are included in the winning throw called kṛta, everything good that people do comes together in him. It is of one who knows what he knows that I have said this.”
व्याख्या
कृत यहाँ पासे का विजयी उच्च फल है, कर्म के अर्थ में “किया हुआ” नहीं। उपमा का बल समावेश पर है: ऊँचे फल में छोटे फल गिने जाते हैं। कथन ज्ञान की स्तुति है, दूसरों के कर्मफल के वास्तविक हस्तान्तरण की प्रक्रिया नहीं समझाता।
Explanation
Kṛta names the highest winning throw, not simply something “done.” The analogy emphasizes inclusion: lesser scores are gathered into the highest. It praises knowledge rather than explaining a literal transfer of others’ deeds.
संदर्भ
हंस रैक्व के ज्ञान की महिमा पासों की परिचित उपमा से बताता है।
Context
The swan describes Raikva’s knowledge through a familiar image from dice.